भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 417 में से

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पृष्ठ 235

२१४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ है, उसीको वहाँ श्रद्धाके नामसे कहा गया है। यह कथन गतिमे सङ्कल्पकी प्रधानता दिखानेके लिये है । इस प्रकार पहले-पहल जो बात श्रद्धाके नामसे कही गयी है, उसीका अन्तिम वाक्यमें जलके नामसे वर्णन किया है; अतः पूर्वापरमे कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-पहलेकी भाँति दूसरे विरोधकी उत्थापना करके उसका निराकरण करते हैं- अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ३ । १ । ६ ॥ चेत्=यदि ऐसा कहा जाय कि; अश्रुतत्वात्=श्रुतिमें तत्त्वोंके साथ जीवात्माके गमनका वर्णन नहीं है, इसलिये ( उनके सहित जीवात्मा जाता है, यह कहना युक्तिसंगत नहीं है ); इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; इष्टादिकारिणाम्=( क्योकि ) उसी प्रसंगमें अच्छे-बुरे कर्म करनेवालोका वर्णन है; प्रतीतेः=अतः इस श्रुतिमे उन शुभाशुभकारी जीवात्माओके वर्णनकी प्रतीति स्पष्ट है, इसलिये ( उक्त विरोध यहाँ नहीं है ) । व्याख्या-यदि कहो कि उस प्रकरणमे जीवात्मा उन तत्त्वोंको लेकर जाता है, ऐसी बात नहीं कही गयी है, केवल जलके नामसे तत्त्वोंका ही पुरुष- रूपमें हो जाना बताया गया है, इसलिये यह कहना विरुद्ध है कि तत्त्वोंसे युक्त जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाता है; तो यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसी प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'जो अच्छे आचरणवाले होते है, वे उत्तम योनिको प्राप्त होते है और जो नीच कर्म करनेवाले होते हैं, वे नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं।' * (छा० उ० ५ । १० । ७) । इस वर्णनसे अच्छे-बुरे कर्म करनेवाले जीवात्माका उन तत्त्वोंके साथ एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होना सिद्ध होता है, इसलिये कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध-इसी प्रकरणमें जहाँ सकामभावसे शुभ कर्म करनेवालोंके लिये धूममार्गसे स्वर्गमें जानेकी बात कही गयी है, वहाँ ऐसा वर्णन आता है कि 'वह स्वर्गमें जानेवाला पुरुष देवताओंका अन्न `है, देवता लोग उसका भक्षण करते हैं' (बृह० उ० ६ । २ । १६) । अतः यह कहना कैसे संगत होगा कि

  • 'तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् ।'
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