भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ३ प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमें विपरीत भावोंका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शङ्काके लिये स्थान नहीं है। सम्बन्ध-कर्तापन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— शास्त्रयोनित्वात् ॥ १ । १ । ३ ॥ शास्त्रयोनित्वात् = शास्त्र (वेद-) में उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये (उसको जगत्का कारण मानना उचित है)। व्याख्या-वेदमें जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० - २ । १) आदि लक्षण बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्का कारण भी बताया गया है। * इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है। सम्बन्ध-मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करने- वाले कुम्भकार आदिकी भाँति ब्रह्मको जगत्का निमित्त कारण बतलाना तो युक्तिसङ्गत है; परन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं— तत्तु समन्वयात् ॥ १ । १ । ४ ॥ चह्वार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) 'जो न भीतरकी ओर प्रज्ञावाला है, न बाहरकी ओर प्रज्ञावाला है, न दोनों ओर प्रज्ञावाला है; न प्रज्ञानघन है, न जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है; जो देखा नहीं गया है, जो व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता, जो बतलानेमें नहीं आ सकता, एकमात्र आत्माकी प्रतीति ही जिसका सार है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व परब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है, इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी मानते हैं। वह परमात्मा है; वह जाननेयोग्य है।'

  • 'एष योनिः सर्वस्य' (मा० उ० ६) 'यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्का कारण है।' 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति ।' (तै० उ० ३ । १) 'ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं तथा अन्तमें प्रयाण करते हुए जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको जाननेकी इच्छा कर, वही ब्रह्म है।'