ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ वेदान्त-दर्शन [.पाद २ और समस्त इन्द्रियोंसे रहित, सबका स्वामी, शासक और आश्रय बताया है।' (३ । १५-१७) । इस प्रकार वहाँ प्रत्येक श्रुति-वाक्यमे एक परब्रह्म परमेश्वरको दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त कहा गया है। उससे भिन्न अपर (कार्य) ब्रह्मका वहाँ वर्णन नहीं है; इसलिये पर और अपर ब्रह्म भिन्न-भिन्न है—यह कहना ठीक नहीं है। अतएव यही सिद्ध हुआ कि वह परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण-निराकार है और वही सगुण-साकार भी है। इन दोनों प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होना उसका स्वभाव ही है; किसी उपाधिके कारण या कार्य- कारण-भेदसे नहीं। सम्बन्ध—दूसरी श्रुतिके प्रमाणसे पुनः उसके एकत्वको दृढ़ करते हैं— अपि चैवमेके ॥ ३ । २ । १३ ॥ अपि च=इसके सिवा; एके=किसी एकशाखावाले (विशेषरूपसे); एवम्= इस बातका प्रतिपादन करते हैं। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे उस परब्रह्म परमेश्वरको सत्य,'ज्ञान और अनन्त बतलाकर उसीसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै०उ० २। १) तथा यह भी कहा है कि 'उसने स्वयं अपने-आपको ही इस रूपमे बनाया है' तथा उसको रसरूप और सबको आनन्दयुक्त करनेवाला कहा है। फिर उसके निर्विशेष लक्षणोंका वर्णन करके उस परमात्मामे स्थिति लाभ करनेवाले साधकका निर्भय पदमे स्थित होना कहा है (तै० उ० २ । ७)। उसके बाद उसकी स्तुति करते हुए कहा है किं 'इसीके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य उदय होता है, इसीके भयसे अग्नि और इन्द्र तथा पाँचवाँ मृत्यु अपने-अपने कार्यमे प्रवृत्त होते हैं।' (तै० उ० २ । ८) इस प्रकार तैत्तिरीय शाखाके मन्त्रोद्वारा भी उस एक ही परमात्माके दोनो प्रकारके लक्षणोका कथन होनेसे भी एक ही परमेश्वरका निर्गुण और सगुण रूप होना सिद्ध होता है। सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं— अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॥ ३ । २ । १४ ॥ हि=क्योंकि; अरूपवत्=रूपरहित निर्विशेष लक्षणोकी भाँति; एव=ही, तत्प्रधानत्वात्=उन सगुण स्वरूपके लक्षणोकी भी प्रधानता है, इसलिये (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म दोनो लक्षणोवाला है)।