ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सत्य है। अतएव वह सगुण और निर्गुण दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है, यही मानना युक्तिसङ्गत है। सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि परब्रह्म परमेश्वर दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है। अब यह जिज्ञासा होती है कि वेदमें ब्रह्मको दोनों प्रकारवाला बताकर अन्तमें जो ऐसा कहा गया है 'नेति नेति' अर्थात् ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है, इन निषेधपरक श्रुतियोंका क्या अभिप्राय है? अतः इसका निर्णय करने- के लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॥ ३ । २ । २२ ॥ प्रकृतैतावत्त्वम् = प्रकरणमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनकी इयत्ताका; प्रतिषेधति = 'नेति नेति' श्रुति निषेध करती है; हि = क्योंकि; ततः = उसके बाद; भूयः = दुबारा; ब्रवीति च = कहती भी है। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे ब्रह्मके मूर्त्त और अमूर्त्त दो रूप बताकर प्रकरण आरम्भ किया गया है। वहाँ भौतिक जगत्में तो पृथिवी, जल और तेज—इन तीनोंको उनके कार्यसहित, मूर्त्त बताया है तथा वायु और आकाशको अमूर्त्त कहा है। उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत्मे प्राण और हृदयाकाशको अमूर्त्त तथा उससे भिन्न शरीर और इन्द्रियगोलकादिको मूर्त्त बताया है। उनमेंसे जिनको मूर्त्त बताया, उनको नाशवान् अर्थात् उस रूपमें न रहनेवाले, किन्तु प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेके कारण 'सत्' कहा, उसी प्रकार अमूर्त्तको अमृत अर्थात् नष्ट न होनेवाला बतलाया। इस प्रकार उन जड तत्त्वोंका विवेचन करते समय ही आधिभौतिक जगत्मे सूर्यमण्डलको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रको मूर्त्तका सार बताया है। इसी प्रकार आधिदैविक जगत्मे सूर्यमण्डलस्थ पुरुषको और आध्यात्मिक जगत्में नेत्रस्थ पुरुषको अमूर्त्तका सार कहा है। इस तरह सगुण परमेश्वरके साकार और निराकार—इन दो रूपोंका वर्णन करके फिर कहा गया है कि 'नेति नेति' अर्थात् इतना ही नहीं, इतना ही नहीं। इससे बढ़कर कोई उपदेश नहीं है। तदनन्तर यह बताया गया है 'उस परम तत्त्वका नाम सत्यका सत्य है, यह प्राण अर्थात् जीवात्मा सत्य है और उसका भी सत्य वह परब्रह्म परमेश्वर है।' (बृह० उ० २ । ३ । १- ६)। इस प्रकार उस परमेश्वरके साकार रूपका