ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४-२७ ] अध्याय ३ २४५ व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि तत्त्व प्रकाश और उष्णता आदि गुणोंसे युक्त हैं, उनका वह रूप जब प्रकट हो, उस अवस्थामे भी वे उन-उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त है और प्रकट न हो—छिपा हो, उस समय भी वे उन गुणोंसे युक्त है । व्यक्त और अव्यक्त स्थितिमे उन स्वाभाविक गुणोंसे युक्त होनेमे कोई अन्तर नहीं आता । उसी प्रकार वह परमेश्वर उपासनाद्वारा प्रत्यक्ष होनेके समय जिस प्रकार समस्त कल्याणमय विशुद्ध दिव्य-गुणोंसे सम्पन्न है, वैसे ही अप्रकट अवस्थामे भी है; ऐसा समझना चाहिये । अग्नि आदि तत्त्वोको प्रकट करनेके लिये जो साधन बताये गये हैं, उनका अभ्यास करनेपर ही वे अपने गुणोंसहित प्रकट होते हैं । उसी प्रकार आराधना करनेपर अप्रकट परमेश्वरका प्रकट हो जाना उचित ही है । सम्बन्ध-उभयलिङ्गवाले प्रकरणको समाप्त करते हुए अन्तमें कहते हैं— अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॥ ३ । २ । २६ ॥ अतः=इन ऊपर बताये हुए कारणोंसे यह सिद्ध हुआ कि; अनन्तेन= ( वह ब्रह्म ) अनन्त दिव्य कल्याणमय गुण-समुदायसे सम्पन्न है; हि=क्योंकि; तथा=वैसे ही; लिङ्गम्=लक्षण उपलब्ध होते हैं । व्याख्या—पूर्वोक्त कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर सत्यसङ्कल्पता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता, सौहार्द, पतितपावनता, आनन्द, विज्ञान, असङ्गता और निर्विकारता आदि असंख्य कल्याणमय गुण-समुदायसे सम्पन्न और निर्विशेष—समस्त गुणोंसे रहित भी है, क्योकि श्रुतिमें ऐसा ही लक्षण मिलता है ( श्वे० उ० ३ । ८—२१ ) । सम्बन्ध—अब परम पुरुष और उसकी प्रकृति भिन्न है या अभिन्न ? इस विषयपर विचार करनेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है । यहाँ पहले यह बात बतायी जाती है कि शक्ति और शक्तिमान्में किस प्रकार अभेद है— उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ॥ ३ । २ । २७ ॥ उभयव्यपदेशात्=दोनों प्रकारका कथन होनेसे; अहिकुण्डलवत्=सर्पके कुण्डलाकारत्वकी भाँति; तु=ही (उसका भाव समझना चाहिये)।