ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है; इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—उक्त श्रुतियोंमें आया हुआ 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं— हेयत्वावचनाच्च ॥ १ । १ । ८ ॥ हेयत्वावचनात्=त्यागनेयोग्य नहीं बताये जानेके कारण; च=भी (उस प्रसङ्गमें 'आत्मा' शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है) । व्याख्या—यदि 'आत्मा' शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगत्का कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है; अतः परब्रह्म परमात्मा ही 'आत्म'शब्दका वाच्य है और वही इस जगत्का निमित्त एवं उपादान कारण है । सम्बन्ध—'आत्मा' की ही भाँति इस प्रसङ्गमें 'सत्' शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है; यह सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं— स्वाप्ययात् ॥ १ । १ । ९ ॥ स्वाप्ययात्=अपनेमें विलीन होना बताया गया है, इसलिये (सत् शब्द भी जड प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८ । १) मे कहा है कि 'यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते' अर्थात् 'हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष (जीवात्मा) सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) से सम्पन्न (संयुक्त) होता है; स्व— अपनेमें अपीत—विलीन होता है, इसलिये इसे 'स्वपिति' कहते हैं।'*
- यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है; अतः यह सन्देह हो सकता है कि 'स्व' शब्द जीवात्माका ही वाचक है, इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण) से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीन