ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सीमित व्यक्तित्वके कारण भिन्न-भिन्न है। प्रलयकालमें सब जीव ब्रह्ममें विलीन होते है, सृष्टिके समय पुनः उसीसे प्रकट होते हैं तथा ब्रह्मकी ही परा प्रकृतिके अन्तर्गत होनेसे उसीके अंश हैं; इसलिये तो वे परमात्मासे अभिन्न कहलाते है और परमात्मा उनका नियामक है तथा समस्त जीव उसके नियम्य है, इस कारण वे उस ब्रह्मसे भी भिन्न हैं और परस्पर भी। यही मानना युक्तिसङ्गत है। सम्बन्ध—इसी बातको पुनः दृढ करते हैं— तथान्यप्रतिषेधात् ॥ ३ । २ । ३६ ॥ तथा=उसी प्रकार; अन्यप्रतिषेधात्=दूसरेका निषेध किया गया है इसलिये भी ( यही सिद्ध होता है ) । व्याख्या—श्रुतिमे जगह-जगह परब्रह्म परमात्मासे भिन्न दूसरी किसी वस्तुकी सत्ताका निषेध किया गया है। (क०उ० २ । १ । ११) इससे भी यही सिद्ध होता है कि अपनी अपरा और परा दोनो शक्तियोंसे सम्पन्न वह परब्रह्म परमात्मा ही नाना रूपोमे प्रकट हो रहा है। उसकी दोनो प्रकृतियोमे नानात्व होनेपर भी उसमे कोई भेद नहीं है। वह सर्वथा निर्विकार, असंग, भेदरहित और अखण्ड है। सम्बन्ध—पूर्वोक्त बातको ही सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं— अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दादिभ्यः ॥ ३ । २ । ३७ ॥ अनेन=इस प्रकार भेद और अभेदके विवेचनसे; आयामशब्दादिभ्यः=तथा श्रुतिमें जो ब्रह्मकी व्यापकताको सूचित करनेवाले शब्द आदि हेतु है, उनसे भी; सर्वगतत्वम्=उस ब्रह्मका सर्वगत ( सर्वत्र व्यापक ) होना सिद्ध होता है। व्याख्या—'उस सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तमसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण हो रहा है।' (श्वेता०उ० ३ । ९ तथा ईशा० १) 'परम पुरुष वह है जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है (गीता ८।२२) इत्यादि श्रुति और स्मृतिके वचनोंमें जो परमात्माकी सर्वव्यापकता- को सूचित करनेवाले 'सर्वगत' आदि शब्द प्रयुक्त हुए है, उनसे तथा उपर्युक्त विवेचनसे भी यही सिद्ध होता है कि वह परमात्मा सर्वत्र व्यापक है। सर्वथा अभेद मान लेनेसे इस व्याप्य-व्यापक भावकी सिद्धि नहीं होगी। अतः यही निश्चय हुआ कि परब्रह्म पुरुषोत्तम अपनी दोनों प्रकृतियोंसे भिन्न भी है और अभिन्न भी; क्योंकि वे उनकी शक्ति हैं। शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता इसलिये तथा उन प्रकृतियोंके अभिन्ननिमित्तोपादान कारण होनेसे भी वे उनसे अभिन्न