ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आकाशको ही उपास्य बताया गया है, न कि उसके अन्तर्वर्ती लोकोंको ।, वहाँ प्रकारान्तरसे उस ब्रह्मको सबका आधार बतानेके लिये पहले उसके भीतरकी वस्तुओंको खोजनेके लिये कहा गया है । इस प्रकार वास्तवमे कोई भेद न होनेके कारण दोनो विद्याओंकी एकता है । इसी प्रकार दूसरी विद्याओंमे भी समानता समझ लेनी चाहिये । सम्बन्ध—पूर्वोक्त विद्याओंकी एकता सिद्ध करनेके लिये दूसरी असमान विद्याओंसे उनकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं— न वा प्रकरणभेदात्परोवरीयस्त्वादिवत् ॥ ३ । ३ । ७ ॥ वा=अथवा; परोवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता आदि गुणोंसे युक्त दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं । व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथ-विद्याका प्रकरण आता है, किन्तु छान्दोग्यमे जो उद्गीथ-विद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है, क्योकि वहाँ उद्गीथकी ॐ कार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है; ( छा० उ० १ । १ पूरा खण्ड ) इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है (छा० उ० १ । ९ । १ से ४ तक ); किन्तु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १ । ३ । १ से २७ तक) । इसलिये उसका फल भी वैसा नहीं बताया गया है । दोनो प्रकरणोंमे केवल देवासुर-संवाद- विषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है । अतः किञ्चिन्मात्र समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य, विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोमे नहीं है । इसलिये उनमें भेद होना उचित है । किन्तु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्य विद्यामे ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है । अतः वर्णनमात्रका भेद होनेके कारण उत्तम और मध्यम फल आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामे भेद सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि दोनोके उद्देश्य, विधेय और फलमे भेद नहीं है । सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शङ्काका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता सिद्ध करते हैं—