ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वभेदात् = सर्वरूप परब्रह्मसम्बन्धी विद्यासे; अन्यत्र = दूसरी विद्याके सम्बन्धमे; इमे = इन पूर्व सूत्रोमे कहे हुए सभी हेतुओंका उपयोग है। व्याख्या-परब्रह्म परमात्मा सबसे अभिन्न सर्वरूप है। अतः उनके तत्त्व- का प्रतिपादन करनेवाली विद्याओंमें भी भेद नहीं है। अतः संज्ञा, प्रकरण और शब्दसे इनकी भिन्नता सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्मकी सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। प्रत्येक प्रकरणमें उसकी बात आ सकती है तथा उसका वर्णन भी भिन्न-भिन्न सभी शब्दोंद्वारा किया जा सकता है। किन्तु ब्रह्मविद्याके अतिरिक्त जो दूसरी विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं है; उनकी एक-दूसरोमे भिन्नता या अभिन्नताको समझनेके लिये पहले कहे हुए प्रकरण, संज्ञा और शब्द—इन तीनों हेतुओंका उपयोग किया जा सकता है। सम्बन्ध—'श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ब्रह्मके जो आनन्द, सर्वज्ञता, सर्वकामता, सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वेश्वरत्व तथा सर्वशक्तिमत्ता आदि धर्म बताये गये हैं, उनका उपसंहार ( संग्रह ) दूसरी जगह ब्रह्मके वर्णनमें किया जा सकता है या नही ?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ३ । ३ । ११ ॥ आनन्दादयः = आनन्द आदि; प्रधानस्य = सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं ( उन सबका अन्यत्र भी ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार कर लेना चाहिये ) । व्याख्या-आनन्द, सर्वगतत्व, सर्वात्मत्व तथा सर्वज्ञता आदि जितने भी परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं, वे यदि श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मके वर्णनमें आये हैं तो दूसरी जगह भी ब्रह्मके वर्णनमें उनका उपसंहार कर लेना चाहिये अर्थात् एक जगहके वर्णनमे जो धर्म या दिव्य गुण-सूचक विशेषण छूट गये हैं, उनकी पूर्ति अन्यत्रके वर्णनसे कर लेनी चाहिये। सम्बन्ध—'यदि ऐसी बात है, तब तो तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आनन्दमय आत्माका प्रकरण प्रारम्भ करके कहा गया है कि 'प्रिय ही उसका सिर है, मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बाँयाँ पंख है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा है।' इसके अनुसार 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्मोंका भी सर्वत्र ब्रह्म- विद्यामें संग्रह हो सकता है ?' ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं—