भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः।' ( श्वेता० उ० ६ । ९)—'वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है। कोई भी न तो इसका जनक है और न स्वामी ही है।' 'स विश्वकृत्' ( श्वेता० ६ । १६ )—'वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है।' 'अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे' (मु० उ० २ । १ । ९)— 'इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं।'—इत्यादिरूपसे उपनिषदोंमे स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है कि सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्‌का कारण है; अतः श्रुति-प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्‌का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—'स्वाप्ययात्' १ । १ । ९ सूत्रमें जीवात्माके स्व ( परमात्मा ) मे विलीन होनेकी बात कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्‌का कारण नहीं है। किन्तु 'स्व' शब्द प्रत्यक्चेतन ( जीवात्मा ) के अर्थमें भी प्रसिद्ध है; अतः यह सिद्ध करनेके लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगत्‌का कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें सृष्टिकी उत्पत्ति का वर्णन करते हुए सर्वात्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसङ्गमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पाँचोंका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमय- को, प्राणमयका मनोमयको, मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमय- को अन्तरात्मा बताया गया है। आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बताया गया है; अपि तु उसीसे जगत्‌की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी महिमाका वर्णन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको जाननेका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमे आनन्दमय नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका? या जीवात्माका? अथवा अन्य किसीका? इसपर कहते हैं— आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १ । १ । १२ ॥