भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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२७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ अक्षर कहते है, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न सङ्ग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता ।' ( ३ । ८ । ८ ) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमे है, इसीने इन सबको धारण कर रक्खा है।' ( ३ । ८ । ९ ) । इस प्रसङ्गमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी है, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमे व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है । इन दोनो गुणोका नेत्रान्त- र्वती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोमे अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योकि प्रतीक उपासनाके लिये सीमित स्थानोमे स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते है। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये । सम्बन्ध- 'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये है, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये ।' ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३ । ३ । २४ ॥ पुरुषविद्यायाम् = पुरुषविद्यामे जो गुण बताये गये है; इव = वैसे गुण; च = भी; इतरेषाम् = अन्य पुरुषोके नहीं हो सकते; अनाम्नानात् = क्योकि श्रुतिमे उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये है । व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्मे ( २ । १ । २ से १० तक ) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है । वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय ( २ । १ । १ ) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है ( २ । १ । २ ) । फिर २ । १ । ३ से लेकर २ । १ । ९