भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र २६ ] अध्याय ३ २७३ श्वेताश्वतरमे समस्त पाशोंसे छूट जाना तथा ( श्वे० उ० १ । ११; २ । १५; ४ । १५, १६; ५ । १३; ६ । १३ ) शोकका नाश होना ( श्वे० उ० ४ । ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमे जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोमे परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अत सूत्रकार कहते है कि 'ऐसे स्थलोमे जहाँ केवल दुःख, बन्धन एव कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्य- शेषके रूपमे दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना ( मु० उ० ३ । २ । ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति ( मु० उ० ३ । २ । ४ ), ब्रह्ममे लीन होना ( मु० उ० ३ । २ । ५ ) ब्रह्मलोकमें परम अमृतरूप हो जाना ( मु० उ० ३ । २ । ६ ), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमे जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४ । १५ । ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि—पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन ( ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि ) का ही वर्णन है, वहाँ पूर्वोक्त हानि ( दुःखनाश आदि ) ही वाक्य-शेष है । इसलिये प्रत्येक समान-विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परन्तु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमे गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्य-शेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते है। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोके ) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते है। किन्तु पैङ्गी शाखावाले 'देवोके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्य- शेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामे 'षोडशिनः स्तोत्रमुपा- करोति' (षोडशीका स्तवन करे ) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परन्तु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामे तारे छिप गये हो और सूर्योदय अभी नहीं हुआ हो । अतः यह कालविशेषका वे० द० १८—