ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २७-२९ ] अध्याय ३ २७५ मुपैति।' (मु० उ० ३ । १ । ३)--'उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्म-ज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयान- मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?' इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः=ज्ञानी पुरुषके सङ्कल्पके अनुसार; उभयथा=दोनो प्रकारकी स्थिति होनेमें; अविरोधात्=कोई विरोध नहीं है (इसलिये ब्रह्मलोकमें जानेका विधान है)। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१) मे कहा है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।' अर्थात् 'यह पुरुष निश्चय ही सङ्कल्पमय है। इस लोकमें पुरुष जैसे सङ्कल्पवाला होता है, वैसा ही देहत्यागके पश्चात् यहाँसे परलोकमें जानेपर भी होता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि जो ज्ञानी पुरुष किसी लोकमे जानेकी इच्छा न करके यहीं मुक्त होनेका सङ्कल्प रखता है, ब्रह्मज्ञानके लिये साधनमे प्रवृत्त होते समय भी जिसकी ऐसी ही भावना रही है, वह तो तत्काल यहीं ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त हो जाता है; परन्तु जो ब्रह्मलोक-दर्शनकी इच्छा रखकर साधनमे प्रवृत्त हुआ था तथा जिसका वहाँ जानेका सङ्कल्प है, वह देवयानमार्गसे वहाँ जाकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारकी गति मान लेनेमे कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यदि इस प्रकार ब्रह्मलोकमें गये बिना यहाँ ही परमात्माको प्राप्त हो जाना मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३ । ३ । २९ ॥ गतेः=गतिबोधक श्रुतिकी; अर्थवत्त्वम्=सार्थकता; उभयथा=दोनों प्रकारसे ब्रह्मकी प्राप्ति माननेपर ही होगी; हि=क्योंकि; अन्यथा=यदि अन्य प्रकारसे माने तो; विरोधः=श्रुतिमें परस्पर विरोध आयेगा। व्याख्या—श्रुतियोंमे कहीं तो तत्काल ही ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है