भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

२८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया जाता है । व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमे बतलाये गये है, उनका जहाँ निर्विशेष ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योकि निर्विशेष- स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोमे भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेष- धर्मोंका वर्णन है । इसलिये वैसे दूसरे धर्मोंका भी अध्याहार उचित ही है । बृहदारण्यकमे गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम अक्षर परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है । वहाँ पहले 'अस्थूलमनणु' ( न स्थूल है न सूक्ष्म है ) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेषस्वरूपके लक्षणोका वर्णन करके अन्तमे कहा है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमे सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए है, उस अक्षरके ही प्रशासनमे द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए है ।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार बतलाया है ( बृह० उ० ३ । ८ । ८-९ ) । इसी तरह मुण्डकोपनिषद्मे 'जाननेमे न आनेवाला, पकड़नेमे न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेषस्वरूपके धर्मोंका वर्णन करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और समस्त प्राणियोका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है ( मु० उ० १ । १ । ६ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों प्रकारके धर्मोंवाला है ।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसङ्कल्पत्व, सर्वज्ञत्व आदि जितने ‘भी परमेश्वरके दिव्य गुण है, वे उनमे स्वाभाविक है, उपाधिकृत नहीं है । अतः जहाँ जिन लक्षणोका वर्णन नहीं है, वहाँ उनका अध्याहार कर लेना चाहिये । इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामे समानधर्मता न होनेके कारण उनमे सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता है । सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा, तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी । इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी व्यवस्था कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— आदरादलोपः ॥ ३ । ३ । ४० ॥