ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४२—४४ ] अध्याय ३ २८७ उसका विकल्प दिखा दिया है ( छा० उ० ८ । २ । १ से १० तक) । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो साधक ब्रह्मलोकके या अन्य किसी भी देवलोकके भोगोंको भोगनेकी इच्छा रखता है, उसीको वे भोग मिलते हैं, ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह आनुषङ्गिक वर्णन है, उस विद्याका मुख्य फल नहीं है। परमात्माके साक्षात्कारमे तो ये भोग विलम्ब करनेवाले विघ्न हैं, अतः साधकको इन भोगोंकी भी उपेक्षा ही करनी चाहिये। इसलिये जिनके मनमे भोग भोगनेका सङ्कल्प नहीं है, उनके लिये जन्म-मरणके बन्धनसे छूटकर तत्काल परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाना ही उसका मुख्य फल बताया गया है। (क० उ० २ । ३ । १४) सम्बन्ध—'यदि ब्रह्मलोकके भोग भी उस परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कारमें विलम्ब करनेवाले हैं, तब श्रुतिने ऐसे फलोंका वर्णन किस लिये किया ?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— प्रदानवदेव तदुक्तम् ॥ ३ । ३ । ४३ ॥ तदुक्तम् = वह कथन, प्रदानवत् = वरदानकी भाँति; एव = ही है। व्याख्या—जिस प्रकार भगवान् या कोई शक्तिशाली महापुरुष किसी श्रद्धालु व्यक्तिको उसकी श्रद्धा और रुचि बढ़ानेके लिये वरदान दे दिया करते हैं, उसी प्रकार स्वर्गके भोगोमे आसक्ति रखनेवाले सकामकर्मी श्रद्धालु मनुष्योकी ब्रह्मविद्यामे श्रद्धा बढ़ाकर उसमे उन्हे प्रवृत्त करनेके लिये एवं कर्मोके फलरूप स्वर्गीय भोगोकी तुच्छता दिखानेके लिये भी श्रुतिका वह कथन है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— लिङ्गभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि ॥ ३ । ३ । ४४ ॥ लिङ्गभूयस्त्वात् = जन्म-मरणरूप संसारसे सदाके लिये मुक्त होकर उस परब्रह्मको प्राप्त हो जानारूप फल बतानेवाले लक्षणोंकी अधिकता होनेके कारण; तद्बलीयः = वही फल बलवान् (मुख्य) है; हि = क्योंकि; तदपि = वह दूसरे फलोका वर्णन भी मुख्य फलका महत्त्व प्रकट करनेके लिये ही है। व्याख्या—वेदान्तशास्त्रमे जहाँ-जहाँ ब्रह्मज्ञानके फलका वर्णन किया गया है, वहाँ इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे सदाके लिये छूटकर उस परब्रह्म पर- मात्माको प्राप्त हो जानारूप फलका ही अधिकतासे वर्णन मिलता है, इसलिये वही प्रबल अर्थात् प्रधान फल है, ऐसा मानना चाहिये; क्योकि उसके