भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ठीक नहीं है; प्राचुर्यात् = क्योंकि 'मयट्' प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है ( विकारको नहीं ) । व्याख्या—'तत्प्रकृतवचने मयट्' ( पा० सू० ५ । ४ । २१ ) इस पाणिनि- सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्द- मय' शब्दमे जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका द्योतक है । इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता । परब्रह्म परमेश्वर आनन्दघनस्वरूप है, इसलिये उसे 'आनन्दमय' कहना सर्वथा उचित है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १ । १ । १४ ॥ तद्धेतुव्यपदेशात् = ( उपनिषदोंमे ब्रह्मको ) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च = भी (यहाँ मयट् प्रत्यय विकार-अर्थका बोधक नहीं है ) । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया है (तै० उ० २ । ७ ) । जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दघन है, इसमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही सदा सबको आनन्द प्रदान कर सकेगा । इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है । सम्बन्ध—केवल मयट् प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ 'आनन्द- मय' शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं, किन्तु— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १ । १ । १५ ॥ च = तथा; मान्त्रवर्णिकम् = मन्त्राक्षरोंमे जिसका वर्णन किया गया है, उस ब्रह्मका; एव = ही; गीयते = (यहाँ) प्रतिपादन किया जाता है ( इसलिये भी आनन्दमय ब्रह्म ही है ) । व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमे जो यह मन्त्र आया है कि—'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप