ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५३-५५ ] अध्याय ३ २९५ तु=किन्तु; उपलब्धिवत्=ज्ञातापनकी उपलब्धिके सदृश ( आत्माका शरीरसे भिन्न होना सिद्ध होता है )। व्याख्या—शरीर ही आत्मा है, यह बात ठीक नहीं है; किन्तु शरीरसे भिन्न, शरीर आदि समस्त भूतों और उनके कार्योंको जाननेवाला आत्मा अवश्य है; क्योंकि मृत्युकालमें शरीर हमारे सामने पड़ा रहता है तो भी उसमे सब पदार्थोंको जाननेवाला चेतन आत्मा नहीं रहता । अतः जिस प्रकार यह प्रत्यक्ष है कि शरीरके रहते हुए भी उसमे जीवात्मा नहीं रहता, उसी प्रकार यह भी मान ही लेना चाहिये कि शरीरके न रहनेपर भी आत्मा रहता है, वह इस स्थूल शरीरमें नहीं तो अन्य ( सूक्ष्म ) शरीरमे रहता है; परन्तु आत्माका अभाव नहीं होता । अतः यह कहना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है कि इस स्थूल शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है। यदि इस शरीरसे भिन्न चेतन आत्मा नहीं होता तो वह अपने और दूसरोंके शरीरोको नहीं जान सकता; क्योंकि घटादि जड पदार्थोंमें एक- दूसरेको या अपने-आपको जाननेकी शक्ति नहीं है। जिस प्रकार सबका ज्ञाता होनेके कारण ज्ञातारूपमे आत्माकी उपलब्धि प्रत्यक्ष है, उसी प्रकार शरीरका ज्ञाता होनेके कारण इस ज्ञेय शरीरसे उसका भिन्न होना भी प्रत्यक्ष है । सम्बन्ध—प्रसङ्गवश प्राप्त हुए नास्तिकवादका संक्षेपसे खण्डन करके, अब पुनः भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है । जिज्ञासा यह है कि भिन्न-भिन्न शाखाओंमें यज्ञोंके उद्गीथ आदि अङ्गोंमें भेद है; अतः यज्ञादिके अङ्गोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना एक शाखा- मे कहे हुए प्रकारसे दूसरी शाखावालोंको करनी चाहिये या नहीं, इसपर कहते हैं— अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ॥ ३ । ३ । ५५ ॥ अङ्गावबद्धाः = यज्ञके उद्गीथ आदि अङ्गोंसे सम्बद्ध उपासनाएँ; शाखासु हि=जिस शाखामें कही गयी हों, उसीमें करने योग्य हैं; न=ऐसी बात नहीं है; तु=किन्तु; प्रतिवेदम् = प्रत्येक वेदकी शाखावाले उसका अनुष्ठान कर सकते हैं। व्याख्या—'ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत'—'ॐ इस एक अक्षरकी उद्गीथके रूपमे उपासना करनी चाहिये' ( छा० उ० १ । १ । १ ), 'लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत'—'पाँच प्रकारके सामकी लोकोंके साथ सम्बन्ध जोड़कर उपासना