भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

सूत्र ६०—६४ ] अध्याय ३ २९९ सम्बन्ध—इसके सिवा— शिष्टेश्च ॥ ३ । ३ । ६२ ॥ शिष्टेः=श्रुतिके शासन ( विधान ) से; च=भी ( यही सिद्ध होता है ) । व्याख्या—जिस प्रकार उद्गीथ आदि स्तोत्रोंके समुच्चयका श्रुतिमे विधान है, उसी प्रकार उनके आश्रित उपासनाओंके समुच्चयका विधान भी उनके साथ ही हो जाता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि कर्मोंके अङ्गोंके अनुसार उनके आश्रित रहनेवाली उपासनाओका समुच्चय हो सकता है । सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको दृढ करते हैं— समाहारात् ॥ ३ । ३ । ६३ ॥ समाहारात्=कर्मोंका समाहार वताया गया है, इसलिये उनके आश्रित उपासनाओका भी समाहार ( समुच्चय ) उचित ही है । व्याख्या—उद्गीथ उपासनामे कहा है कि 'स्तोत्रगान करनेवाला पुरुष होताके कर्ममे जो स्तोत्रसम्बन्धी त्रुटि हो जाती है, उसका भी संशोधन कर लेता है।' ( छा० उ० १ । ५ । ५ ) । इस प्रकार प्रणव और उद्गीथकी एकता समझकर उद्गान करनेका महत्त्व दिखाया है । इस समाहारसे भी अङ्गाश्रित उपासनाका समुच्चय सूचित होता है । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ ३ । ३ । ६४ ॥ गुणसाधारण्यश्रुतेः=गुणोंकी साधारणता बतानेवाली श्रुतिसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—उपासनाका गुण जो ॐकार है, उसका प्रयोग समान भावसे दिखाया है । जैसे कहा है कि 'उस ( ॐ ) अक्षरसे ही यह त्रयीविद्या (तीनो वेदोसे सम्बन्ध रखनेवाली यज्ञादि कर्मसम्बन्धी विद्या ) प्रवृत्त होती है, ॐ ऐसा कहकर ही आश्रावण कर्म करता है, ॐ ऐसा कहकर होता ( कथन ) करता है, ॐ ऐसा कहकर ही उद्गाता स्तोत्रगान करता है ।' (छा० उ० १ । १ । ९) इसी प्रकार कर्माङ्ग-सम्बन्धी गुण जो कि उद्गीथ आदि है, उनका भी समान भावसे प्रयोग श्रुतिमे विहित है । इसलिये भी उपासनाओंका उनके आश्रयभूत कर्माङ्गोंके साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है ।