ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—श्रुतिने ब्रह्मविद्याकी परम्पराका वर्णन करते हुए कहा है कि 'उस ब्रह्मज्ञानका उपदेश ब्रह्माने प्रजापतिको दिया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । ब्रह्मचारी नियमानुसार गुरुकी सेवा आदि कर्तव्य कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करते हुए वेदका अध्ययन समाप्त करे, फिर आचार्यकुलसे समावर्तनसंस्कारपूर्वक स्नातक बनकर लौटे और कुटुम्बमे रहता हुआ पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता रहे । पुत्र और शिष्यादिको धार्मिक बनाकर समस्त इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित करे।' इन सब नियमोंको बताकर उनके फलका इस तरह वर्णन किया है—'इस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८ । १५ । १) । इस तरह विद्यापूर्वक कर्म करनेके विधानसे यह बात सिद्ध होती है कि विद्या कर्मका अङ्ग है । सम्बन्ध—इतना ही नहीं; अपि तु— नियमाच्च ॥ ३ । ४ । ७ ॥ नियमात्=श्रुतिमे नियमित किया जानेके कारण; च=भी (कर्म अवश्य कर्तव्य है, अतः विद्या कर्मका अङ्ग है, यह सिद्ध होता है) । व्याख्या—श्रुतिका आदेश है कि 'मनुष्य शास्त्रविहित श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए ही इस जगत्मे सौ वर्षोंतक जीवित रहनेकी इच्छा करे । इस प्रकार जीवनयात्राका निर्वाह करनेपर तुझ मनुष्यमे कर्म लिप्त नहीं होंगे । इसके सिवा दूसरे प्रकारका ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म लिप्त न होवे ।' (ईशा० २) इस प्रकार आजीवन कर्मानुष्ठानका नियम होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—इस प्रकार जैमिनिके मतका वर्णन करके सूत्रकार अपने सिद्धान्त- को सिद्ध करनेके लिये उत्तर देते हैं— अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ८ ॥ तु=किन्तु; अधिकोपदेशात्=श्रुतिमें कर्मोंकी अपेक्षा अधिक ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका कथन होनेके कारण; बादरायणस्य=व्यासजीका मत; एवं=जैसा प्रथम सूत्रमें कहा था वैसा ही है; तद्दर्शनात्=क्योंकि श्रुतिमें विद्याकी अधिकता दिखलायी गयी है ।