ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः इसी बातको सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३० ॥ अपि च=इसके सिवा; स्मर्यते=स्मृति भी इसी बातका समर्थन करती है । व्याख्या—मनुस्मृतिमें कहा है कि— जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः । आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ 'जो मनुष्य प्राणसङ्कटमे पड़नेपर जहाँ कहींसे भी अन्न लेकर खा लेता है, वह उसी प्रकार पापसे लिप्त नहीं होता जैसे कीचड़से आकाश' ( मनु० १० । १०४ ) । इस प्रकार जो स्मृति-वचन उपलब्ध होते हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण जानेकी परिस्थिति उत्पन्न न होनेतक आहार-शुद्धिसम्बन्धी सदाचारका परित्याग नहीं करना चाहिये । सम्बन्ध—अब श्रुति-प्रमाणसे भी अभक्ष्य-भक्षणका निषेध सिद्ध करते हैं— शब्दश्चातोऽकामकारे ॥ ३ । ४ । ३१ ॥ अकामकारे=इच्छानुसार अभक्ष्यभोजनके निषेधमे; शब्दः=श्रुतिप्रमाण; च=भी है; अतः=इसलिये ( प्राणसङ्कटकी स्थिति आये बिना निषिद्ध अन्न, जलका ग्रहण नहीं करना चाहिये ) । व्याख्या—इच्छानुसार अभक्ष्य-भक्षणका निषेध करनेवाली श्रुति भी है,* इसलिये यह सिद्ध हुआ कि जहाँ कहीं श्रुतिमे ज्ञानकी विशेषता दिखलानेके लिये विद्वान्के सम्बन्ध- मे यह कहा है कि 'उसके लिये कुछ भी अभक्ष्य नहीं होता', वह केवल विद्याकी स्तुतिके लिये है। सिद्धान्त यही है कि जबतक प्राण जानेकी परिस्थिति न पैदा हो जाय, तबतक अभक्ष्य-त्यागसम्बन्धी सदाचारका त्याग नहीं करना चाहिये । सम्बन्ध—यहाँतक यह सिद्ध किया गया कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर भी अभक्ष्य-त्याग आदिके आचारका पालन करना चाहिये। अब यह जिज्ञासा होती है
- स्तेनो हिरण्यस्य सुराँ पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरं स्तैरिति ॥ ( छ० उ० ५ । १० । ९ ) 'सुवर्ण चुरानेवाला, शराबी, गुरुपत्नीगामी तथा ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग रखनेवाला भी पतित होता है।' सुरा (मद्य) अभक्ष्य है। यहाँ इसे पीनेवालेको महापातकी बताकर उसके पानका निषेध किया गया है ।