ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ स्वयं कहा है कि 'उन भक्तोंके लिये मै सुलभ हूँ' (गीता ८ । १४), 'उनका योग-क्षेम स्वयं वहन करता हूँ' (९ । २२) । भगवान्ने अपने भक्तोंका महत्त्व बतलाते हुए श्रीमद्भागवतमें यहाँतक कह दिया है कि 'मैं सदा भक्तोके अधीन रहता हूँ' (९ । ४ । ६३) । इसके सिवा इतिहास, पुराण और स्मृतियोंमे यह वर्णन विशेषरूपसे पाया जाता है कि भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंपर भगवान्की विशेष कृपा होती है। यही कारण है कि भगवान्के इस भक्तवत्सल स्वभावको जाननेवाले निरन्तर उनके भजन, स्मरणमे ही लगे रहते हैं (गीता १५ । १९) तथा वे भक्तजन मुक्तिका भी निरादर करके केवल भक्ति ही चाहते है। सम्बन्ध—अब अन्य धर्मोंकी अपेक्षा भागवतधर्मोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते है— अतस्त्वितरज्यायो लिङ्गाच्च ॥ ३ । ४ । ३९ ॥ अतः=ऊपर बतलाये हुए इन सभी कारणोंसे (यह सिद्ध हुआ कि); इतरज्यायः=अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवान्की भक्तिविषयक धर्म श्रेष्ठ है; तु=इसके सिवा; लिङ्गात्=लक्षणोंसे; च=भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए कारणोंसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि अन्य सभी प्रकारके धर्मोंसे भगवान्की भक्ति-विषयक धर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसके सिवा, स्मृति-प्रमाणसे भी यही बात सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 'बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् पद्मनाभके चरणकमल- से विमुख है तो उसकी अपेक्षा उस चाण्डालको श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित है; क्योकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परन्तु वह बहुत मानवाला ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।' (७ । ९ । १०)