ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ३ । ७ । २२) । इस प्रकार श्रुतिमे उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्- ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८ । ६१) । दूसरी श्रुतिमे भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामे निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २ । १) इसलिये साधकको उचित है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी उपासना करे। सम्बन्ध—क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न प्रतीके न हि सः ॥ ४ । १ । ४ ॥ प्रतीके=प्रतीकमे; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योकि; सः= वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है। व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३ । १९ । १) इस प्रकार जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमे ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना है। वहाँ प्रतीकमे आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योकि वह उपासकका अन्तरात्मा नहीं है। जैसे मूर्ति आदिमे भगवान्की भावना करके उपासना की जाती है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमे भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमे भगवान्के उद्देश्यसे की हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना मानकर ग्रहण करते है और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी देते है; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है। परन्तु प्रतीकको अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—प्रतीकोपासना करनेवालेको प्रतीकमे ब्रह्मभाव करना चाहिये या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥