भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

३४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ दृष्टान्तसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेका विधान सिद्ध किया गया है और श्रीमद्भगवद्गीतामे भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि 'हे पार्थ ! मेरे लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है, मुझे तीनों लोकोंमे किसी भी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति नहीं करनी है, तो भी मैं कर्मोंमें संलग्न रहता हूँ; क्योंकि यदि मैं कभी सावधानीके साथ कर्म न करूँ तो ये सब लोग मेरा अनुकरण करके नष्ट-भ्रष्ट हो जायें और मैं उनके नाशमे निमित्त बनूँ।' इत्यादि ( ३ । २२ से २४ ) । तथा यह भी कहा है कि 'विद्वान् पुरुष कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमे भेद उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं उन्हींकी भाँति कर्म करता हुआ उनको कर्मोंमे लगाये रक्खे।' ( ३ । २५ ) । 'यज्ञरक्षाके लिये किये जानेवाले कर्मोंसे भिन्न कर्मोंद्वारा ही यह मनुष्य बन्धनमे पड़ता है।' इत्यादि ( ३ । ९ ) । इस प्रकार श्रुति और स्मृतिप्रमाणोसे यही सिद्ध होता है कि विद्वान्‌के लिये कर्म करनेका कथन केवल लोकसंग्रहके लिये है। सम्बन्ध—आश्रमके लिये विहित कर्मोंके सिवा, अन्य कर्म उनके द्वारा किये जाते हैं या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ॥ ४ । १ । १७ ॥ अतः=इनसे; अन्यापि=भिन्न क्रिया भी; उभयोः=ज्ञानी और साधक दोनोंके लिये; हि=ही; एकेषाम्=किसी एक शाखावालोके मतमे विहित है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा है, 'आजीवन शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही इस लोकमें सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करे।' इत्यादि ( ईशा० २ ) 'तथा जो कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह कर्मोंद्वारा मृत्युसे तरकर ज्ञानसे अमृतको प्राप्त होता है।' ( ईशा० ११ ) इस प्रकार किसी- किसी शाखावालोके मतमें ज्ञानी और साधक दोनोके लिये ही इन आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंके सिवा अन्य सभी विहित कर्मोंका अनुष्ठान आजीवन करते रहनेका विधान है। अतः ज्ञानी लोकसंग्रहके लिये प्रत्येक शुभ कर्मका अनुष्ठान कर्तापनके अहंकारसे रहित तथा कर्मासक्ति और फलासक्तिसे सर्वथा अतीत हुआ कर सकता है; क्योंकि ज्ञानोत्तरकालमे किये जानेवाले किसी भी कर्मसे उसका लेप नहीं होता। ( गीता ४ । २२; १८ । १७ ) । सम्बन्ध—क्या विद्या और कर्मके समुच्चयका भी श्रुतिमें विधान है ? इसपर कहते हैं—