भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 417 में से

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१६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है।' इस प्रसङ्गमें आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है। तथापि यह 'ज्योतिः' शब्द किसका वाचक है ? ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता; अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह ब्रह्म- का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतस्वरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है ।* इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ 'ज्योतिः' शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है। यह 'तैजस' भी 'ज्योतिः'का पर्याय ही है। अतः 'ज्योतिः'की भाँति 'तैजस' शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है, जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्याय- के बारहवें खण्डमें 'गायत्री'के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है। अतः उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं— छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात्- तथा हि दर्शनम् ॥ १ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात्=गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है ); न=ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न=तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि ); तथा=उस प्रकारके वर्णनद्वारा;

  • वह मन्त्र इस प्रकार है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या- मृतं दिवि ॥ ( छा० उ० ३ । १२ । ६ )
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