भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

३५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध-उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । २ । ५ ॥ तच्छ्रुतेः=तद्विषयक श्रुति-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि; भूतेषु=( प्राण और मन-इन्द्रियसहित जीवात्मा ) पाँचो सूक्ष्म भूतोमे ( स्थित होता है ) । व्याख्या-पूर्वश्रुतिमें जो यह कहा है कि प्राण तेजमे स्थित होता है, उससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा, मन और समस्त इन्द्रियाँ—ये सब-के-सब सूक्ष्मभूत-समुदायमे स्थित होते हैं, क्योकि सभी सूक्ष्मभूत तेजके साथ मिले हुए हैं। अतः तेजके नामसे समस्त सूक्ष्मभूत-समुदायका ही कथन है । सम्बन्ध-पूर्व श्रुतिमें प्राणका केवल तेजमें ही स्थित होना कहा गया है, ' अतः यदि सब भूतोंमें स्थित होना न मानकर एक तेजस्तत्त्वमें ही स्थित होना मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नैकस्मिन्दर्शयतो हि ॥ ४ । २ । ६ ॥ एकस्मिन्=एक तेजस्तत्त्वमे स्थित होना; न=नहीं माना जा सकता; हि=क्योकि; दर्शयतः=श्रुति और स्मृति दोनो जीवात्माका पाँचो भूतोसे युक्त होना दिखलाती हैं । व्याख्या-इस बातका निर्णय पहले ( ब्रह्मसूत्र ३ । १ । २ मे ) कर दिया गया है कि एक जल या एक तेजके कथनसे पाँचो तत्त्वोंका ग्रहण है; क्योकि उस प्रकरणमे पृथिवी, जल और तेज—इन तीन तत्त्वोकी उत्पत्तिका वर्णन करके तीनोका मिश्रण करनेकी बात कही है । अतः जिस तत्त्वकी प्रधानता है, उसीके नामसे वहाँ वे तीनो तत्त्व पुकारे गये है; इससे, शरीर पाञ्चभौतिक है, यह बात प्रत्यक्ष दिखायी देनेसे तथा श्रुतिमे भी पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय और तेजोमय ( बृह० उ० ४ । ४ । ५ )—इन विशेषणोका जीवात्माके साथ प्रयोग देखा जानेसे भी यही सिद्ध होता है कि प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके सहित जीवात्मा एकमात्र तेजस्तत्त्वमे स्थित नहीं होता; अपि तु शरीरके बीजभूत पाँचो भूतोके सूक्ष्म स्वरूपमें स्थित होता है । वही इसका सूक्ष्म शरीर है, जो कि कठोपनिषद्में रथके नामसे कहा गया है ( क० उ० १ । ३ । ३) । इसके सिवा स्मृतिमें भी कहा है—