भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

३५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तानि=वे प्राण, अन्तःकरण, पाँच सूक्ष्मभूत तथा इन्द्रियाँ सब-के- सब; परे=उस परब्रह्ममें ( विलीन हो जाते हैं ); हि=क्योंकि; तथा=ऐसा ही; आह=श्रुति कहती है । व्याख्या—जो महापुरुष जीवनकालमें ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है, वह एक प्रकारसे निरन्तर उस परब्रह्म परमात्मामे ही स्थित रहता है; उससे कभी अलग नहीं होता तो भी लोकदृष्टिसे शरीरमें रहता है, अतः जब प्रारब्ध पूरा होने- पर शरीरका नाश हो जाता है, उस समय वह शरीर, अन्तःकरण और इन्द्रिय आदि सब कलाओंके सहित उस परमात्मामे ही विलीन हो जाता है। श्रुतिमें भी यही कहा है—'उस महापुरुषका जब देहपात होता है, उस समय पंद्रह कलाएँ और मनसहित समस्त इन्द्रियोंके देवता—ये सब अपने-अपने अभिमानी देवताओ- में स्थित हो जाते हैं, उनके साथ जीवन्मुक्तका कोई सम्बन्ध नहीं रहता, उसके बाद विज्ञानमय जीवात्मा, उसके समस्त कर्म और उपर्युक्त सब देवता—ये सब- के-सब परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं।' ( मु० उ० ३ । २ । ७ )। सम्बन्ध—शरीरसम्बन्धी सब तत्त्वोंके सहित वह महापुरुष उस परमात्मामें किस प्रकार स्थित होता है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— अविभागो वचनात् ॥ ४ । २ । १६ ॥ वचनात्=श्रुतिके कथनसे ( यह मालूम होता है कि ); अविभागः= विभाग नहीं रहता। व्याख्या—मरणकालमे साधारण मनुष्योका जीवात्माके सहित उस परमदेवमे स्थित होना कहा गया है तथा अपने-अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोमे कर्मफलका उपभोग करनेके लिये वहाँसे उनका जाना भी बताया गया है ( क० उ० २ । ५ । ७ )। इसलिये प्रलयकी भाँति परमात्मामे स्थित होकर भी वे उनसे विभक्त ही रहते हैं; किंतु यह ब्रह्मज्ञानी महापुरुष तो सब तत्त्वोंके सहित यहीं परमात्मामें लीन होता है; अतः विभागरहित होकर अपने परम कारणभूत ब्रह्ममे मिल जाता है । श्रुति भी ऐसा ही वर्णन करती है—'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अपना-अपना नाम-रूप छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परमपुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ )

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