ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ 'जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराट्रूप समस्त जगत् तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।' यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं। इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम् = परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण; च = भी; इतरौ = जीवात्मा और प्रकृति; न = अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते। व्याख्या—इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदि गुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये 'सर्वज्ञ' आदि विशेषण दिये गये हैं, जो न तो प्रधान (जड प्रकृति) के लिये उपयुक्त हो सकते हैं और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् (३। १। ७) मे उल्लेख है कि—'पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्।' अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।' इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३। १। २ मे भी कहा है कि— 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥' 'शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।' इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है। अतः यहाँ जीव और