ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि 'वैश्वानर' नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है । परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्रूपमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यों- का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते हैं— अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥ अभिव्यक्तेः= (भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः= ) कोई विरोध नहीं है; इति=ऐसा; आश्मरथ्यः=आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं । व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनुष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते हैं । यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराट्रूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान् देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो- पनिषद्में परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है । सम्बन्ध—अब इस विषयमे बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥