भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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४६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास- स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता; क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार- निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है । यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिप्त है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है । दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

  • अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ( श्वेता० ५ । १३ ) ‘दुर्गम संसारके भीतर व्याप्त, आदि-अन्तसे रहित, समस्त जगत्की रचना करने- वाले, अनेक रूपधारी, समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए एक अद्वितीय परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है ।’