ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है । इस शङ्काका निवारण करनेके लिये कहते हैं— सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और, सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोको धारण करनारूप क्रिया, ( परमेश्वरकी ही है ); प्रशासनात्=क्योकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है । व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे चलकर कहा है कि 'इसी अक्षरके प्रशासन- मे द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोसे कहा जानेवाला काल— ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित है । इसीके प्रशासनमे पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियों अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोसे निकल- कर बहती है।' इत्यादि । ( बृह० उ० ३ । ८ । ९ ) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करने- वाला बताया गया है । यह कार्य जड प्रकृतिका नहीं हो सकता । अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं । सम्बन्ध—इसके सिवा— अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः—यहाँ अक्षरमे अन्य ( प्रधान आदि ) के लक्षणोका निराकरण किया गया है, इसलिये; च=भी; 'अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे आगे चलकर कहा गया है —'वह अक्षर देखनेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सुननेवाला है, मनन करनेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि । ( बृह० उ० ३। ८।११ ) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमे देखने, सुनने और जाननेमे आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोका निराकरण किया गया है;* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड
- उपर्युक्त श्रुतिमे अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमे प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका निराकरण किया गया है ।