भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें 'दहर' नामसे कहा हुआ तत्त्व क्या है ? इसपर कहते हैं— दहर उत्तरेभ्यः ॥ १ । ३ । १४ ॥ दहरः=उक्त प्रकरणमे 'दहर' शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः=क्योकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—छान्दोग्य ( ८ । १ । १ ) मे कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्म- पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम् ।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य-शरीरमे कमलके आकारवाला एक घर ( हृदय ) है, उसमे सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमे जिसे ज्ञातव्य बताया गया है, वह 'दहर' शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योकि आगेके वर्णनमे इसीके भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है तथा उसके विषयमे यह भी कहा है कि 'यह आत्मा, सब पापोसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशून्य, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। इत्यादि ( ८ । १ । ५ ) । तदनन्तर आगे चलकर ( छा० उ० ८ । ३ । ४ मे ) कहा है कि 'यही आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म है । इसीका नाम सत्य है।' इससे यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिङ्गं च ॥ १ । ३ । १५ ॥ गतिशब्दाभ्याम्=ब्रह्ममे गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे; तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोमे ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; लिङ्गम्=इस वर्णनमे आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है। व्याख्या—इस प्रसङ्गमे यह बात कही गयी है कि—'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ ( छा० उ० ८।