ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) ( ८ ) परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें पहुँचनेपर ज्ञानीका किसी प्रकारके प्राकृत शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, वह अपने दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होता है ( ४ । ४ । १ ) । वह उसकी सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित मुक्तावस्था है ( ४ । ४ । २ )। ( ९ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले जीवको वहाँके भोगोंका उपभोग संकल्पमात्रसे भी होता है और उसके संकल्पानुसार प्राप्त हुए शरीरके द्वारा भी ( ४ । ४ । ८ ) तथा ( ४ । ४ । १२ ) । ( १० ) देवयान-मार्गसे जानेवाले विद्वानोंमेंसे कोई तो परब्रह्मके परमधाममें जाकर सायुज्य मुक्ति-लाभ कर लेते है ( ४ । ४ । ४ ) और कोई चैतन्यमात्र स्वरूपसे अलग भी रह सकते है ( ४ । ४ । ७ ) । ( ११ ) कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवाले उस लोकके स्वामीके साथ प्रलय- कालके समय सायुज्यमुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं ( ४ । ३ । १० ) । ( १२ ) उत्तरायण-मार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवालोंके लिये रात्रिकाल या दक्षिणायनकालमें मृत्यु होना बाधक नहीं है ( ४ । २ । १९-२० )। ( १३ ) जीवका कर्तापन शरीर और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे औपचारिक है ( २ । ३ । ३३ से ४० तक )। ( १४ ) जीवके कर्तापनमें परमात्मा ही कारण है ( २ । ३ । ४१ ) । ( १५ ) जीवात्मा विभु है; उसका एकदेशित्व शरीरके सम्बन्धसे ही है, वास्तवमें नहीं है ( २ । ३ । २९ ) । ( १६ ) जिन ज्ञानी महापुरुषोंके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती, जो सर्वथा निष्काम और आप्तकाम हैं, उनको यहीं ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है । उनका ब्रह्मलोकमें जाना नहीं होता । ( १७ ) ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहके लिये सभी प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान कर सकता है ( ४ । १ । १६-१७ ) । ( १८ ) ब्रह्मज्ञान सभी आश्रमोंमें हो सकता है । सभी आश्रमोंमें ब्रह्म- विद्याका अधिकार है ( ३ । ४ । ४९ ) । ( १९ ) ब्रह्मलोकमें जानेवालेका पुनरागमन नहीं होता ( ४ । ४ । २२)।