ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ।' अर्थात् 'यह जो संप्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्ध स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है । यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा । उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है ।' इस मन्त्रमे 'संप्रसाद'के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं, जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं; इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामे होना असंभव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्द- को 'जीवात्मा'का वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।'' ऐसी शङ्का उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमे अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये है । इसलिये उसके आधारपर 'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते है— अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ १ । ३ । २० ॥ परामर्शः=( उक्त प्रकरणमे ) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत; च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है । अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमे वर्णन है । परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत-से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामे भी कही गयी है ( १४ । २ ) । इसलिये उक्त प्रकरणमे जीवात्माका वर्णन आ जाने- मात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है । सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १ । ३ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः=श्रुतिमे 'दहर'को बहुत छोटा बताया गया