ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३ सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला क्यों बताया गया है ? इसपर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥ तु=उस परमपुरुषको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि= हृदयमे स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्= क्योकि ( ब्रह्मविद्यामे ) मनुष्यका ही अधिकार है । व्याख्या—उपनिषदोंमे वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार मनुष्यको ही है । अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमे यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म परमेश्वरको 'अङ्गुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारकी बात आ जानेसे प्रसङ्गवश दूसरा प्रकरण चल पड़ा । पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है ? इसपर कहते हैं— तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥ बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते है कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर जो देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी ( अधिकार है ), संभवात्=क्योकि उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना संभव है । व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोमे तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उसके द्वारा परमात्म-ज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है, इसलिये उनका अधिकार न बतलाना तो उचित ही है । परन्तु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है । जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमे श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है । अतः उनमे पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है । अतएव साधन करनेपर उन्हे ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है । इसलिये भगवान् बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमे भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेका अधिकार है ।