भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ छान्दोग्योपनिषद्मे ( ४ । १ । १ से ४ तक ) वह प्रकरण इस प्रकार है—'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था । वह अतिथियोंके भोजनके लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था । उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रक्खी थीं । एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था । उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमे कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे । उनमेसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे ! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमे फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा ।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा— 'अरे भाई ! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है !' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा—'रैक्व कैसा है ?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है, तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है ।' इस प्रकार हसोसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमे शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्या-ग्रहणके लिये गया । रैक्व मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये । उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा । यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था । अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामे शूद्रका अधिकार है । सम्बन्ध—राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥ क्षत्रियत्वावगतेः = जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे जाना जाता है इससे; च = तथा; उत्तरत्र = बादमे कहे हुए; चैत्ररथेन = चैत्ररथके सम्बन्धसे; लिङ्गात् = जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे भी ( उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है ) ।

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 91, कुल 417 में से · BharatKosha