बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1002, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें९८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| ननु विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते द्रष्टुः सा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति च। दृष्टिश्च द्रष्ट्रा क्रियते; दृष्टिकर्तृत्वाद्धि द्रष्टेत्युच्यते; क्रियमाणा च द्रष्ट्रा दृष्टिर्न विपरिलुप्यत इति चाशक्यं वक्तुम्। ननु न विपरिलुप्यत इति वचनादविनाशिनी स्यात्; न, वचनस्य ज्ञापकत्वात्। न हि न्यायप्राप्तो विनाशः कृतकस्य वचनशतेनापि वारयितुं शक्यते; वचनस्य यथाप्राप्तार्थज्ञापकत्वात्।<br><br>नैष दोषः; आदित्यादिप्रकाशकत्ववद् दर्शनोपपत्तेः; यथा आदित्यादयो नित्यप्रकाशस्वभावा एव सन्तः स्वाभाविके न नित्येनैव प्रकाशेन प्रकाशयन्ति, न ह्यप्रकाशात्मानः सन्तः प्रकाशं कुर्वन्तः प्रकाशयन्तीत्युच्यन्ते; किं | शङ्का- किंतु द्रष्टाकी वह दृष्टि है और उसका लोप नहीं होता—यह कथन तो परस्परविरुद्ध है। दृष्टि तो द्रष्टाद्वारा ही की जाती है; दृष्टिकर्ता होनेके कारण ही वह द्रष्टा कहा जाता है; द्रष्टाके द्वारा दृष्टि की जानेवाली है और उसका लोप नहीं होता--यह तो कहा ही नहीं जा सकता। यदि कहो कि 'न विपरिलुप्यते' इस वचनके अनुसार वह अविनाशिनी होनी ही चाहिये तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वचन तो केवल ज्ञापक है कृतक वस्तुका विनाश न्यायप्राप्त है, अतः उसका सैकड़ों वचनोंसे भी निवारण नहीं किया जा सकता; क्योंकि वचन तो जो वस्तु जैसी प्राप्त हुई है, उसे वैसी ही सूचित कर देनेवाला है।<br><br>समाधान— यह दोष नहीं है; क्योंकि आदित्यादिके प्रकाशकत्वके समान इसका देखना भी उपपन्न ही है। जिस प्रकार आदित्यादि नित्यप्रकाशस्वभाव होते हुए ही अपने नित्यस्वाभाविक प्रकाशसे प्रकाश करते हैं, वे स्वयं अप्रकाशस्वरूप होकर उससे अपनेसे भिन्न प्रकाश उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं--ऐसा उनके विषयमें नहीं कहा जाता तो, |