बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1005, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९९१ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
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| दृष्ट्या स्वयंज्योतिःस्वभावया पश्यन्नेव भवति सुषुप्ते ।<br>कथं तर्हि न पश्यतीति ? | स्वयंज्योतिःस्वरूपा दृष्टिसे स्वप्नमें देखता ही रहता है ।<br>शङ्का—तो फिर 'नहीं देखता' ऐसा क्यों कहा जाता है ? |
| उच्यते—न तु तदस्ति । किं तत् ? द्वितीयं विषयभूतम् । किं विशिष्टम् ? ततो द्रष्टुरन्यदन्यत्वेन विभक्तं यत् पश्येद् यदुपलभेत । यद्धि तद्विशेषदर्शनकारणमन्तःकरणं चक्षूरूपं च, तदविद्ययान्यत्वेन प्रत्युपस्थापितमासीत् । तदेतस्मिन् काल एकीभूतम्, आत्मनः परेण परिष्वङ्गात् । द्रष्टुर्हि परिच्छिन्नस्य विशेषदर्शनाय करणमन्यत्वेन व्यवतिष्ठते । अयं तु स्वेन सर्वात्मना सम्परिष्वक्तः स्वेन परेण प्राज्ञेनात्मना प्रिययेव पुरुषः; तेन न पृथक्त्वेन व्यवस्थितानि करणानि विषयाश्च । तदभावाद् विशेषदर्शनं नास्ति, करणादिकृतं हि तन्नात्मकृतम्; | समाधान—बतलाते हैं—यहां तो वह वस्तु ही नहीं है । वह कौन ? दूसरी विषयभूत वस्तु । किस विशेषणसे युक्त ? उस द्रष्टासे अन्य अर्थात् अन्यरूपसे विभक्त, जिसे कि वह देखे-उपलब्ध करे। क्योंकि जो उस विशेष दर्शनका कारण चक्षुरूप अन्तःकरण था, वह अविद्याके द्वारा अन्यरूपसे प्रस्तुत किया हुआ था । इस समय प्रत्यगात्माका परमात्माके साथ आलिङ्गन होनेके कारण वह एकरूप हो गया है । परिच्छिन्न द्रष्टाके विशेष दर्शनके लिये ही इन्द्रियाँ अन्य रूपसे स्थित होती हैं । किंतु इस समय, जैसे पुरुष अपनी प्रियासे आलिङ्गित हाता है, उसी प्रकार यह स्वयं सर्वात्मभावसे अपने परमरूप प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित रहता है; इसलिये उस अवस्थामें इन्द्रिय और विषय पृथक्रूपसे विद्यमान नहीं रहते और उनका अभाव होनेके कारण विशेषदर्शन भी नहीं होता, क्योंकि वह तो इन्द्रियादिका किया हुआ ही होता है, आत्माका किया |