भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1013, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1013

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ९९९


भेदकल्पना परमात्मनि प्रत्युक्ता ॥ २४-३० ॥भेदके परिणामभेदोंकी कल्पना की गयी है, उसका भी खण्डन कर दिया गया¹ ॥ २४-३० ॥

जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होनेमें हेतु

| जाग्रत्स्वप्नयोरिव यद् विजानीयात्तद् द्वितीयं प्रविभक्तमन्यत्वेन नास्तीत्युक्तम् । अतः सुषुप्ते न विजानाति विशेषम् ।<br><br>ननु यद्यस्यायमेव स्वभावः किन्निमित्तमस्य विशेषविज्ञानं स्वभावपरित्यागेन ? अथ विशेषविज्ञानमेवास्य स्वभावः; कस्मादेष विशेषं न विजानातीति ?<br><br>उच्यते, शृणु — | जागरित और स्वप्नके समान जिसे पुरुष जाने, ऐसी उससे अन्य-रूपसे विभक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है-यह बात ऊपर कही गयी । इसलिये सुषुप्तिमें उसे किसी विशेष-का ज्ञान नहीं होता ।<br><br>शङ्का-किंतु इसका यदि यही स्वभाव है तो अपने स्वभावको छोड़कर इसे विशेष ज्ञान होता ही क्यों है ? और यदि विशेष विज्ञान ही इसका स्वभाव है तो इसे सुषुप्ति-में विशेषका ज्ञान क्यों नहीं होता ?<br><br>समाधान-बतलाते हैं, सुनो- |

यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद् रसयेदन्योऽन्यद् वदेदन्योऽन्यच्छृणुयादन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद् विजानीयात् ॥ ३१ ॥

जहां (जागरित या स्वप्नावस्थामें) आत्मासे भिन्न अन्य-सा होता है वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, अन्य


१. भर्तृप्रपञ्चका मत है कि परमात्मामें दृष्टि, घ्राति इत्यादि भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं । उनमें दृष्टिका चक्षु और रूपाकारसे परिणाम होता है तथा घ्रातिका घ्राणेन्द्रिय और गन्धाकारसे । इसी प्रकार अन्यान्य शक्तियोंके भी पृथक्-पृथक् परिणाम होते है , इस कल्पनाका 'परमात्मा निरवयव और एकरस है' इस युक्ति-से निराकरण करा दिया गया ।