बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1020, कुल 1402 में से
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| १००६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| दिव्यभोगोपकरणनिवृत्त्यर्थम्, मनुष्याणामेव यानि भोगोपकरणानि तैः सम्पन्नानामप्यतिशयेन सम्पन्नः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दः । | इस पदका प्रयोग दिव्यभोगसामग्रीकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् जो मनुष्योंकी ही भोगसामग्रियाँ हैं, उनसे जो लोग सम्पन्न हैं, उनमें भी जो सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। |
| तत्र आनन्दानन्दिनोरभेदनिर्देशान्नार्थान्तरभूतत्वमित्येतत्। परमानन्दस्यैवेयं विषयविषय्याकारेण मात्रा प्रसृतेति ह्युक्तम् “यत्र वा अन्यदिव स्यात्” इत्यादिवाक्येन । तस्माद् युक्तोऽयम् 'परम आनन्दः' इत्यभेदनिर्देशः । युधिष्ठिरादितुल्यो राजात्रोदाहरणम् । | यहाँ आनन्द और आनन्दवान्के अभेदका निर्देश किया गया है, इस लिये आनन्दी आत्मासे आनन्द कोई भिन्न पदार्थ नहीं है । विषय और विषयीरूपसे यह परमानन्दका ही अंश फैला हुआ है—यह बात “जहाँ कोई दूसरेके समान हो” इत्यादि वाक्यसे कही गयी है। अतः यहाँ 'यह परम आनन्द है' ऐसी अभेदोक्ति उचित ही है । इसमें युधिष्ठिर आदिके समान राजा उदाहरण है। |
| दृष्टं मनुष्यानन्दमादिं कृत्वा शतगुणोत्तरोत्तरक्रमेणोन्नीय परमानन्दं यत्र भेदो निवर्तते तमधिगमयति । अत्रायमानन्दः शतगुणोत्तरोत्तरक्रमेण वर्धमानो यत्र वृद्धिकाष्ठामनुभवति, यत्र गणितभेदो निवर्तते, अन्यदर्शनश्रवण- | श्रुति अनुभवसिद्ध मानुष आनन्दसे आरम्भ करके उसका उत्तरोत्तर क्रमशः सौ-सौगुना उत्कर्ष दिखाते हुए जहाँ भेदकी निवृत्ति हो जाती है, उस परमानन्दको प्रदर्शित करती है। यह आनन्द क्रमशः उत्तरोत्तर सौगुना बढ़ता हुआ जहाँ वृद्धिकी पराकाष्ठातक पहुँच जाता है, जहाँ अन्य दर्शन, श्रवण और मननका अभाव हो जानेके कारण |