भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1031, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1031

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७


नात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥

वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल-फल बन्धनसे छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३६ ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
सोऽयं प्राकृतः शिरःपाण्यादिमान् पिण्डो यत्र यस्मिन् कालेऽप्यणिमानं अणोर्भावमणृत्वं कार्श्यमित्यर्थः, न्येति निगच्छति, किंनिमित्तम् ? जरया वा स्वयमेव कालपक्वफलवज्जीर्णः कार्श्यं गच्छति । उपतपतीत्युपतपञ्ज्वरादिरोगः, तेनोपतपता वा, उपतप्यमानो हि रोगेण विषमाग्नितयान्नं भुक्तं न जरयति, ततोऽन्नरसेनानुपचीयमानः पिण्डः कार्श्यमापद्यते । तदुच्यते उपतपता वेत्यणिमानं निगच्छति ।<br><br>यदा अत्यन्तकार्श्यं प्रतिपन्नो जरादिनिमित्तैः, तदोर्ध्वोच्छ्वा-वह यह प्राकृत–शिर एवं हाथ-पांव आदि अवयवोंवाला पिण्ड जिस समय अणिमा–अणुभाव–अणुत्व अर्थात् कृशताको 'नेति' प्राप्त हो जाता है। किस कारणसे ? वृद्धावस्थासे–कालद्वारा पकाये हुए फलके समान स्वयं ही जीर्ण-कृश हो जाता है। अथवा उपतपत्से–जो समीप रहकर तपाता है, वह ज्वरादि रोग 'उपतपत्' (उपताप) कहलाता है, उससे; क्योंकि रोगसे उपतप्त हुआ पुरुष विषम अग्नि हो जानेके कारण खाये हुए अन्नको नहीं पचा सकता, अतः अन्नके रससे वृद्धिको प्राप्त न होनेवाला पिण्ड कृशताको प्राप्त हो जाता है। इसीसे यह कहा जाता है कि 'उपतपता वा'–अथवा ज्वरादि रोगसे कृशताको प्राप्त हो जाता है।<br><br>जिस समय वृद्धावस्थादि कारणोंसे शरीर अत्यन्त कृशताको प्राप्त हो जाता है, उस समय जीव ऊर्ध्वोच्छ्वास
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