बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1037, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1037
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३
| किं तत्क्रियाप्रणुन्ना आहोस्वित् तत्कर्मवशात् स्वयमेव गच्छन्ति परलोकशरीरकर्तृणि च भूतानीति; अत्रोच्यते दृष्टान्तः— | करनेवाले आदित्यादि भूत जाते हैं, वे उसके वागादि व्यापार [ यानी कहने आदि ] से प्रेरित होकर जाते हैं अथवा उसके कर्मवश स्वयं ही जाते हैं—इसमें दृष्टान्त कहा जाता है। |
तद् यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३८॥
जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥
| तद् यथा राजानं प्रयियासन्तं प्रकर्षेण यातुमिच्छन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्यस्तं यथाभिसमायन्त्याभिमुख्येन समायन्त्येकीभावेन तमभिमुखा आयन्त्यनाज्ञप्ता एव राज्ञा केवलं तज्जिगमिषामिज्ञाः, एवमेवेममात्मानं भोक्तारमन्तकाले मरणकाले सर्वे प्राणा वागादयोऽभिसमायन्ति। | वह दृष्टान्त–जिस प्रकार जानेकी तैयारी करनेवाले अर्थात् प्रकर्षसे जानेकी इच्छावाले अर्थात् जानेकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाले राजाके अभिमुख होकर उसके उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेता लोग एक साथ मिलकर सामने आते हैं; राजाकी आज्ञाके बिना ही केवल उसकी जानेकी इच्छा जानकर ही तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार अन्तकाल यानी मरणसमयमें वागादि सम्पूर्ण प्राण भोक्ता आत्माके सम्मुख एकत्रित हो जाते हैं। |