बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1055, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१
सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण
| येऽस्य बन्धनसंज्ञका उपाधिभूताः, यैः संयुक्तस्तन्मयोऽयमिति विभाव्यते, ते पदार्थाः पुञ्जीकृत्यैहकत्र प्रतिनिर्दिश्यन्ते-- | इस आत्माके जो बन्धनसंज्ञक उपाधिभूत पदार्थ हैं और जिनसे संयुक्त होकर यह तद्रूप है-ऐसा समझा जाता है, उन पदार्थोंका यहाँ एक जगह एकत्रित करके निर्देश किया जाता है— |
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स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदम्मयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥
वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है। जो कुछ इदंमय ( प्रत्यक्ष ) और अदोमय ( परोक्ष ) है, वह वही है। वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है। शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मा पापी होता है। पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है। कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामनावाला होता है
बृ० उ० ६६—