बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1063, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०४९
करता है। इस लोकमें यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करनेवाला पुरुष ही ऐसा करता है। अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं] जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| तत्तस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति । तदेवैति तदेव गच्छति, सक्त आसक्तस्तत्रोद्भूताभिलाषः सन्नित्यर्थः, कथमिति ? सह कर्मणा यत् कर्म फलासक्तः सन्नकरोत्तेन कर्मणा सहैव तदेति तत् फलमेति । किं तत् ? लिङ्गं मनः—मनःप्रधानत्वाल्लिङ्गस्य मनो लिङ्गमित्युच्यते । <br><br> अथ वा लिङ्ग्यतेऽवगम्यतेऽवगच्छति येन तल्लिङ्गं तन्मनो यत्र यस्मिन्निषक्तं निश्चयेन सक्तमुद्भूताभिलाषमस्य संसारिणः, तदभिलाषो हि तत् कर्म कृतवान्, तस्मात्तन्मनोऽभिषङ्गवशा- | तत्—उस विषयमें यह श्लोक अर्थात् मन्त्र भी है। तदेवैति–उसीको जाता है, सक्त-आसक्त होकर अर्थात् उसमें अपनी अभिलाषा प्रकट कर, किस प्रकार जाता है ? कर्मके सहित अर्थात् जिस कर्मको उसने फलासक्त होकर किया था, उस कर्मके सहित ही वह उसके फलके प्रति जाता है। वह (जानेवाला) कौन है ? लिङ्ग–मन, लिङ्गदेह मनःप्रधान है, इसलिये मनको 'लिङ्ग' ऐसा कहा जाता है। <br><br> अथवा जिसके द्वारा लिङ्गन — अवगम होता है अर्थात् जिससे साक्षी जानता है, उसे लिङ्ग कहते हैं, इस संसारीका वह मन जिसमें निष्क्त-निश्चयपूर्वक सक्त अर्थात् उद्भूताभिलाष होता है यानी अपनी अभिलाषा प्रकट करता है; उस अभिलाषासे युक्त होकर ही उसने वह कर्म किया था, इससे अर्थात् उस चित्तकी आसक्तिके कारण ही |