भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1066, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1066
१०५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| रसः, नोर्ध्वं न तिर्यङ् नाध आत्मनोऽन्यत्कामयितव्यं वस्त्वन्तरम् । यस्य सर्वात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येच्छृणुयान्मन्वीत विजानीयाद्वा, एवं विजानन् कं कामयेत । ज्ञायमानो ह्यन्यत्वेन पदार्थः कामयितव्यो भवति, न चासावन्यो ब्रह्मविद आप्तकामस्यास्ति । य एवात्मकामतया आप्तकामः स निष्कामोऽकामोऽकामयमानश्चेति मुच्यते । न हि यस्य आत्मैव सर्वं भवति, तस्यानात्मा कामयितव्योऽस्ति । अनात्मा चान्यः कामयितव्यः सर्वं चात्मैवाभूदिति विप्रतिषिद्धम् । सर्वात्मदर्शिनः कामयितव्याभावात् कर्मानुपपत्तिः । <br><br> ये तु प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्म कल्पयन्ति ब्रह्मविदोऽपि, तेषां नात्मैव सर्वं भवति; प्रत्यवायस्य जिहासितव्यस्य आत्मनोऽन्यस्य | आत्मासे भिन्न कामनाके योग्य कोई अन्य वस्तु न ऊपर है, न इधर-उधर है और न नीचे है । जिसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वह किसके द्वारा किसे देखे, सुने, मनन करे अथवा जाने ? इस प्रकार जाननेवाला किसकी कामना करे । जो पदार्थ अन्यरूपसे जाना जाता है, वही कामनाके योग्य होता है और यह अन्य पदार्थ आप्तकाम ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें है नहीं । अतः जो भी आत्मकाम होनेके कारण आप्तकाम होता है, वही निष्काम, अकाम और कामना न करनेवाला भी है; इसलिये मुक्त हो जाता है । जिसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है उसके लिये कामनाके योग्य कोई अनात्मा नहीं रहता । कोई दूसरा कामनाके योग्य अनात्मा भी रहे और सब कुछ आत्मा भी हो गया—ऐसा कथन तो विपरीत ही है । अतः सर्वात्मदर्शीके लिये कामनाके योग्य वस्तुका अभाव हो जानेके कारण कर्म सम्भव नहीं है । <br><br> जो लोग प्रत्यवायकी निवृत्तिके लिये ब्रह्मवेत्ताके भी कर्मकी कल्पना करते हैं, उनके लिये सब आत्मा ही नहीं होता, क्योंकि प्रत्यवाय तो आत्मासे भिन्न कोई अन्य त्यागने |