बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1069, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1069
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५५ |
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| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| बाधितो भवेत्, कर्महेतुकश्च मोक्षः प्राप्नोति, न ज्ञाननिमित्त इति । स चानिष्टः, अनित्यत्वं च मोक्षस्य प्राप्नोति, न हि क्रियानिर्वृत्तोऽर्थो नित्यो दृष्टः । नित्यश्च मोक्षोऽभ्युपगम्यते, "एष नित्यो महिमा" (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इति मन्त्रवर्णात् । | सिद्धान्त है, वह बाधित हो जायगा तथा मोक्ष कर्मनिमित्तक हो जायगा, ज्ञाननिमित्तक नहीं रहेगा और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे मोक्षकी अनित्यता भी प्राप्त होती है, कर्मसे निष्पन्न होनेवाला पदार्थ नित्य नहीं देखा गया और मोक्ष तो नित्य ही माना गया है, जैसा कि यह "ब्राह्मणकी नित्य महिमा है" इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है । |
| न च स्वाभाविकात् स्वभावाद- न्यन्नित्यं कल्पयितुं शक्यम् । स्वाभाविकश्चेदग्न्युष्णवदात्मनः स्वभावः, स न शक्यते पुरुषव्या- पारानुभावीति वक्तुम् । न ह्यग्नेरौष्ण्यं प्रकाशो वाग्निव्या- पारानन्तरानुभावी । अग्निव्या- पारानुभावी स्वाभाविकश्चेति विप्रतिषिद्धम् । | इसके सिवा स्वाभाविक (अकृ- त्रिम) स्वरूपसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नित्य है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । यदि अग्निके उष्णत्वके समान मोक्ष आत्माका स्वाभाविक स्वरूप है तो उसके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता कि वह पुरुषके व्यापारद्वारा पीछे- से होनेवाला है । अग्निका उष्णत्व या प्रकाश भी अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला नहीं है । वह अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला है और स्वाभाविक भी है—ऐसा कहना तो विरुद्ध है । |
| ज्वलनव्यापारानुभावित्वम् उष्णप्रकाशयोरिति चेन्न, अन्यो- पलब्धिव्यवधानापगमाभिव्य- क्त्यपेक्षत्वात् । ज्वलनादिपूर्वक- | यदि कहो कि अग्निके उष्णत्व और प्रकाशका ज्वलन व्यापारके पीछे होना तो सिद्ध होता ही है—तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह तो दूसरेकी उपलब्धिके व्यवधानकी निवृत्तिकी अभिव्यक्तिकी अपेक्षासे है ।* ज्वलनादि व्यापारपूर्वक जो |
* आगे इसी वाक्यकी व्याख्या की जाती है ।