बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 108, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ज्ञाननिमित्तायाः प्रवृत्तेर्निवृत्तिरेव, न पुनर्यत्नः कार्यस्तदभावे । तस्मात्प्रतिषेधविधीनां वस्तुयाथात्म्यज्ञाननिष्ठतैव, न पुरुषव्यापारनिष्ठतागन्धोऽप्यस्ति । | अतः उसकी निवृत्ति ही हो जाती है, उसके अभावके लिये उसे फिर कोई यत्न नहीं करना पड़ता । अतः प्रतिषेधविधियोंका वस्तुके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान करानेमें ही तात्पर्य है, उनमें पुरुषकी व्यापारनिष्ठताकी गन्ध भी नहीं है । | | तथेहापि परमात्मादियाथात्म्यज्ञानविधीनां तावन्मात्रपर्यवसानतैव स्यात् । तथा तद्विज्ञानसंस्कृतस्य तद्विपरीतार्थज्ञाननिमित्तानां प्रवृत्तीनामनर्थार्थत्वेन ज्ञायमानत्वात् परमात्मादियाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तन्निमित्तविज्ञाने बाधितेऽभावः स्यात् । | इसी प्रकार यहाँ भी परमात्मादिके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विधियोंका तात्पर्य केवल उतनेहीमें है । तथा उसके ज्ञानके संस्कारसे युक्त पुरुषको उससे विपरीत पदार्थोंके ज्ञानकी निमित्तभूता प्रवृत्तियोंकी अनर्थार्थकताका ज्ञान हो जानेसे परमात्मादिके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे स्वाभाविक प्रवृत्तिविषयक ज्ञानके बाधित हो जानेसे प्रवृत्तिका अभाव ही हो जाता है । | | ननु कलञ्जादिभक्षणादेरनर्थार्थत्ववस्तुयाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तद्भक्ष्यत्वादिविषयविपरीतज्ञाने निवर्तिते तद्भक्षणाद्यनर्थप्रवृत्त्यभाववदप्रतिषेधविषयत्वाच्छास्त्रविहितप्रवृत्त्यभावो न युक्त इति चेत् । | पूर्व०—किंतु कलञ्जभक्षणादि अनर्थार्थक वस्तुओंके स्वरूपज्ञानकी स्मृतिसे उनके भक्ष्यत्वादिविषयक स्वभावसिद्ध विपरीत ज्ञानके निवृत्त हो जानेपर जैसे उनके भक्षणादिकी अनर्थमयी प्रवृत्तिका अभाव हो जाता है वैसे ही शास्त्रविहित प्रवृत्तिका अभाव होना तो उचित नहीं है, क्योंकि वह प्रतिषेधका विषय नहीं है । |