बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1080, कुल 1402 में से
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| १०६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| आश्रिताः—अथ तदा मर्त्यो मरणधर्मा सन्, कामवियोगात् समूलतः, अमृतो भवति । | समूल नष्ट हो जाती हैं ] तब यह मर्त्य—मरणधर्मा होनेपर भी कामनाओंका समूल नाश हो जानेके कारण अमृत हो जाता है । |
| अर्थादनात्मविषयाः कामा अविद्यालक्षणा मृत्यव इत्येतदुक्तं भवति; अतो मृत्युवियोगे विद्वान् जीवन्नेव अमृतो भवति । अत्र अस्मिन्नेव शरीरे वर्तमानो ब्रह्म समश्नुते, ब्रह्मभावं मोक्षं प्रतिपद्यत इत्यर्थः । अतो मोक्षो न देशान्तरगमनाद्यपेक्षते । तस्माद् विदुषो नोत्क्रामन्ति प्राणाः, यथावस्थिता एव स्वकारणे पुरुषे समवनीयन्ते; नाममात्रं हि अवशिष्यते—इत्युक्तम् । | यहाँ अर्थतः यह बात कह दी गयी कि अनात्मविषयक कामनाएँ ही अविद्यारूप मृत्यु हैं, अतः मृत्युका वियोग हो जानेपर विद्वान् जीवित रहते हुए ही अमृत हो जाता है । वह यहाँ—इस शरीरमें ही रहता हुआ ब्रह्मको अर्थात् ब्रह्मभावरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है । अतः मोक्षको देशान्तरमें जाने आदिकी अपेक्षा नहीं है; इसलिये विद्वान्के प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता । वे जैसेके तैसे ही अपने कारण पुरुषमें पूर्णतया लीन हो जाते हैं, केवल नाममात्र ही बच रहता है--ऐसा ऊपर कहा गया है । |
| कथं पुनः समवनीतेषु प्राणेषु देहे च स्वकारणे प्रलीने विद्वान् मुक्तोऽत्रैव सर्वात्मा सन् वर्तमानः पुनः पूर्ववद् देहित्वं संसारित्वलक्षणं न प्रतिपद्यते ? इत्यत्रोच्यते—तत्तत्रायं दृष्टान्तः—<br><br>यथा लोके 'अहिः सर्पः, तस्य | किंतु प्राणोंके लीन हो जानेपर तथा देहके अपने कारणमें मिल जानेपर विद्वान् किस प्रकार मुक्त होकर अर्थात् यहीं सर्वात्मा होकर विद्यमान रहते हुए पूर्ववत् पुनः संसारित्वरूप देहिभावको प्राप्त नहीं होता ? इस विषयमें अब कहा जाता है—उसमें यह दृष्टान्त है—जिस प्रकार लोकमें अहि—सर्प, उसकी |