बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| १०६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| आत्मज्योतिषा जगदवभास्यमानं प्रज्ञानेत्रं विज्ञानज्योतिष्मत् सदविभ्रंशद् वर्तते । | आत्मज्योतिसे अवभासित होता हुआ जगत् प्रज्ञानेत्र और विज्ञान-ज्योतिर्मय होकर विशेषरूपसे च्युत न होता हुआ विद्यमान रहता है । |
| यः कामप्रश्नो विमोक्षार्थो याज्ञवल्क्येन वरो दत्तो जनकाय, सहेतुको बन्धमोक्षार्थलक्षणो दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभूतः स एष निर्णीतः सविस्तरो जनकयाज्ञवल्क्याख्यायिकारूपधारिण्या श्रुत्या; संसारविमोक्षोपाय उक्तः प्राणिभ्यः । इदानीं श्रुतिः स्वयमेवाह—विद्यानिष्क्रयार्थं जनकेनैवमुक्तमिति; कथम् ? सोऽहमेवं विमोक्षितस्त्वया भगवते तुभ्यं विद्यानिष्क्रयार्थं सहस्रं ददामि-इति ह एवं किल उवाच उक्तवान् जनको वैदेहः । | याज्ञवल्क्यने विमोक्षके लिये जनकको जो कामप्रश्नरूप वर दिया था, उस दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभूत बन्धमोक्षार्थलक्षण सहेतुक प्रश्नका जनक-याज्ञवल्क्य-आख्यायिकारूप-धारिणी श्रुतिने विस्तारपूर्वक निर्णय कर दिया तथा प्राणियोंको संसार-से मुक्त होनेका उपाय भी बतला दिया । अब श्रुति स्वयं ही कहती है कि इस विद्याका बदला चुकाने-के लिये जनकने इस प्रकार कहा । किस प्रकार ? आपके द्वारा इस प्रकार विमुक्त किया हुआ मैं इस विद्यादानसे उऋण होनेके लिये आप श्रीमान्को एक सहस्र [गौएँ] देता हूँ—ऐसा विदेहराज जनकने कहा । |
| अत्र कस्माद् विमोक्षपदार्थे निर्णीते, विदेहराज्यमात्मानमेव च न निवेदयति, एकदेशोक्ताविव सहस्रमेव ददाति ? तत्र कोऽभिप्राय इति ? | यहाँ मोक्षतत्त्वका निर्णय हो जानेपर भी जनक विदेहराज्य और अपनेको ही समर्पण क्यों नहीं कर देता ? उसका जैसे एकदेश ही कहा गया हो—इस प्रकार केवल सहस्र [ गौएँ ] ही क्यों देता है ? इसमें उसका क्या अभिप्राय है ? |