भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1097, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1097

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०८३


संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
तदेतद् ब्रह्म प्रकृतम्; अहो वयं कृतार्था इत्यभिप्रायः। यदेतद् ब्रह्म विजानीमः, तद् न चेद् विदितवन्तो वयम् वेदनं वेदः, वेदोऽस्यास्तीति वेदी, वेद्येव वेदिः, न वेदिः अवेदिः, ततः अहम् अवेदिः स्याम्। यदि अवेदिः स्याम्, को दोषः स्यात् ? महती अनन्तपरिमाणा जन्म-मरणादिलक्षणा विनष्टिः—विनशनम्। अहो वयमस्मान्महतो विनाशाद् विमुक्ताः, यदद्वयं ब्रह्म विदितवन्त इत्यर्थः।जान लें तब तो अहो ! हम कृतार्थ हो गये—ऐसा इसका अभिप्राय है। हम जिस इस ब्रह्मको जानते हैं; यदि उसे हमने न जाना होता, 'वेद' का अर्थ वेदन है, जिसे वेद (ज्ञान) है, उसे वेदी कहते हैं, वेदीको ही 'वेदि' कहा गया है, जो वेदि न हो वह 'अवेदि' है,—तो इससे मैं अवेदि हो जाता। यदि मैं 'अवेदि' हो जाता तो क्या दोष होता ? महती—जन्म-मरणादिरूप अनन्त परिमाणवाली विनष्टि--क्षति होती। तात्पर्य यह है कि हमने जो अद्वय ब्रह्मतत्त्वको जान लिया है, इससे अहो ! हम महान् विनाशसे मुक्त हो गये हैं।
यथा च वयं ब्रह्म विदित्वा अस्माद् विनशनाद् विप्रमुक्ताः, एवं ये तद्विदुः, अमृतास्ते भवन्ति; ये पुनः नैवं ब्रह्म विदुः, ते इतरे ब्रह्मविद्भ्योऽन्ये अब्रह्मविद इत्यर्थः दुःखमेव जन्ममरणादिलक्षणमेव अपियन्ति प्रतिपद्यन्ते न कदाचिदप्यविदुषां ततो विनिवृत्तिरित्यर्थः; दुःखमेव हि ते आत्मत्वेनोपगच्छन्तीति ॥ १४ ॥जिस प्रकार ब्रह्मको जानकर हम इस विनाशसे सम्यक् प्रकारसे मुक्त हो गये हैं, इसी प्रकार जो उसे जानते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। किंतु जो उसे इस प्रकार नहीं जानते, वे इतर—ब्रह्मवेत्ताओंसे भिन्न अन्य लोग अर्थात् अब्रह्मवेत्ता जन्म-मरणादिरूप दुःखको ही प्राप्त होते हैं। तात्पर्य यह है कि अज्ञानियोंकी उससे कभी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वे दुःखको ही (दुःखमय शरीरको ही) आत्मभावसे ग्रहण करते हैं ॥ १४ ॥