भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

१०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १


| काम्यानि कर्माणि विहितानि तथा सर्वानर्थबीजाविद्यादिदोषवतस्तज्जनितेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहाररागद्वेषादिदोषवतश्च तत्प्रेरिताविशेषप्रवृत्तेरिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थिनो नित्यानि कर्माणि विधीयन्ते, न केवलं शास्त्रनिमित्तान्येव । | काम्य कर्मोंका विधान स्वर्गकामादि दोषयुक्त पुरुषोंके लिये किया गया है, उसी प्रकार सब प्रकारके अनर्थके बीजभूत अविद्यादि दोषवान् तथा उनसे होनेवाली इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छा एवं इष्टनिवृत्ति और अनिष्टप्राप्तिके द्वेषरूप दोषसे युक्त तथा उन रागद्वेषसे प्रेरित होकर समानरूपसे प्रवृत्त होनेवाले एवं इष्ट-प्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये नित्यकर्मोंका विधान किया गया है, वे केवल शास्त्रजनित ही नहीं हैं। | | न चाग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यपशुबन्धसोमानां कर्मणां स्वतः काम्यनित्यत्वविवेकोऽस्ति । कर्तृगतेन हि स्वर्गादिकामदोषेण कामार्थता । तथा अविद्यादिदोषवतः स्वभावप्राप्तेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारार्थिनः तदर्थान्येव नित्यानि इति युक्तम्, तं प्रति विहितत्वात् । | इसके सिवा अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध और सोमादि कर्मोंका स्वतः कोई काम्यत्व या नित्यत्वका विवेक नहीं होता। कर्ताकी स्वर्गादिसम्बन्धिनी कामनाके दोषसे ही उनकी सकाम्यता सिद्ध होती है। इसी प्रकार जो अविद्यादि दोषसे युक्त है और जिसे स्वभावप्राप्त इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिकी इच्छा है, उसीके लिये नित्य-कर्म हैं—ऐसा मानना उचित ही है, क्योंकि उसीके लिये उनका विधान है। | | न परमात्मयाथात्म्यविज्ञान- | जिसे परमात्माके वास्तविक |